झांसी। भूपेन्द्र रायकवार। महारानी वीरांगना लक्ष्मीबाई की धरती है।वीरता और शौर्य की धरती। देश के स्वाभिमान और गौरव की धरती। यहां पर बहन उर्मिला देवी प्रधान शिक्षिका रहती हैं। उन्होंने अपने घर के द्वार प्रतियोगी परीक्षाओं UPSSSC में शामिल होने वाले निषाद समाज के युवाओं के लिए खोल दिए हैं ।उनके ठहरने भोजन आदि की व्यवस्था करके वह एक अनुकरणीय कार्य कर रही हैं ।
प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने वाले युवा यह भली भांति समझते हैं कि उन्हें भगीरथ प्रयास करना है। बहुत कठिन काम करना है जिसमें चारों तरफ से बाधाएं ही बाधाएं हैं। कहीं कोई सहारा नहीं है। ऐसे में कोई उर्मिला देवी जब खड़ी होती है संबल बनकर तो उसे संघर्ष करने का माद्दा और बढ़ जाता है ।
यही उपाय है आगे बढ़ने का, समाज के उत्कर्ष का, उत्थान का। इसी तरह के स्थल अगर जगह जगह कार्यरत हो जाते हैं तो वहां शामिल होने वाले युवाओं को मन में कोई यह भाव नहीं रहेगा कि वहां जाएंगे तो ठहरने की कहां क्या व्यवस्था मिलेगी?
पढ़ने का वातावरण मिलेगा कि नहीं मिलेगा? फिर निश्चिंत भाव से वहां जाएंगे और सफलता की संभावनाएं भी कुछ प्रतिशत तो अवश्य ही बढ़ जाएगी। समाज को उर्मिला देवी की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस रूप को स्थान स्थान पर विस्तारित करना होगा।
निश्चित रूप से वह समय आएगा जब ये होनहार कामयाब होकर कहीं नियुक्त होंगे ।फिर उन्हें ये दिन याद आएंगे और वे स्वयं भी कुछ ना कुछ अपनी ओर से करने के लिए प्रयासरत होंगे क्योंकि संघर्ष के दिनों में कहीं कोई छोटा-मोटा सहारा भी मिल जाता है तो वह जीवन भर याद रहता है।
ये भाव हमारी इच्छा, हमारी प्रवृत्ति, हमारे रुझान को उस दिशा की ओर ले जाएंगे जो परोपकारी हैं,जो सबके हित के लिए हैं,सबके भले के लिए और समाज में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के आगे लाने के लिए कृत्य संकल्पित हैं।







